Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



लोग मशगूल हैं


नरेंद्र श्रीवास्तव


                                                                    
लोग मशगूल हैं,यूँ नोट कमाने में।
कि  आग लग रही है, जमाने में।।

इस आग से बच न पायेगा कोई।
क्यों समझते नहीं, समझाने में।।

ऊपर वाले  की  नज़र  पैनी  है।
देर नहीं  लगती नंबर आने में।।

भूख तो फिर लगेगी,रात में ही।
डटे हो क्यों खुरच के खाने में।।

सुकूँ दिल हो तो शांति होगी घर।
मजा आयेगा त्यौहार मनाने में।।

निष्ठा से निबाहें दायित्व अपने तो।
चार चाँद लगें,हमारे आशियाने में।।

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें