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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



ग्रीष्म


नवीन कुमार भट्ट


                                                      
घर आँगन को छोड़ के,ढूढ़ें पीपल नीम।
भरी दोपहरी जेष्ठ की,सोते यहाँ हकीम।।
 
सूरज मामा तप रहे,उगल रहे है आग।
पतझड़ सारे पेड़ है,सूना पड़ा है बाग।।

बरगद के नीचे पडे, राही लेते चैन।
घर में दम घुटनें लगे ,रहते है बेचैन।।

त्राही त्राही मच रही,बहे पसीना धार।
गर्मी हमको टीसती,है ये  हद के पार।।

बरगद पीपल नीम की,आनें लगी है याद।
यैसी भीषण गर्मी में,लोग  करें  फरियाद।।

पानी पानी हो गया,हाल हुये बेहाल।
गर्मी तेरे आन पर,उठते कई सवाल।।

नदियाँ सूखी हो रही,सूखे कितनें कूप।
इससे पहले न दिखे, ये  मायाबी रूप।। 	 

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