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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



गर्मी के दोहे:
पानी-पानी प्राण......


घनश्याम बादल


 
सूरज बदला ले रहा, गरमी करे प्रहार ।
धूप हुई बैरन बड़ी, छांव बांटती  प्यार।।

नदिया सूखी नार सी, पोखर हैं बेहाल ।
बादल खाली घूमते, फिरें बजाते गाल ।।

पानी ‘पानी’पा रहा , पानी-पानी प्राण ।
किरणें ऐसे बींधती,  जैसे बींधें बाण  ।।

बादल अब बा-दल चलें, धरती रही पुकार ।
या तो मौला तू बरस, या ले अब प्राण ।।

फा़के़ से बुढ़िया मरे, गरमी मरे जवान ।
बनिया मंदी से मरे, सूखे मरे किसान ।।

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