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साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 1, अंक16, जुलाई(प्रथम), 2017





   मान्यवर ,

   ' साहित्य सुधा का जून प्रथम अंक पढ़ा , बहुत अच्छा लगा । संपादकीय में ' ताण्डवी निशाचरी को हो रहा अर्पण सवेरा । मेरे घर की चांदनी पर छा गया काला लुटेरा ।' पंक्तियों ने वर्तमान समय के यथार्थ को उकेरकर पाठक को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वह कैसे समय और परिस्थितियों में जी रहा है ।अति सुन्दर एवं यथार्थपरक अभिव्यक्ति के लिए बधाई । डाक्टर कामिनी कामायनी की लघुकथाएं अच्छी है। राजेश श्रीवास्तव की कहानी ' मुझे दूसरे के घर जाना है ना ' आज भी समाज में लङके और लङकी के बीच व्याप्त भेदभाव को रेखांकित करती है ।' खाला ' कहानी का कथ्य और कथन अच्छा है परन्तु वर्तनी की अशुद्धियों के कारण पढ़ने का मजा किरकिरा हो जाता है । पत्रिका की अन्य रचनाएं भी अच्छी हैं । पत्रिका के नियमित प्रकाशन हेतु आपको बहुत बहुत बधाई ।

   - सरिता सुराणा

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