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वर्ष: 3, अंक 52, जनवरी(प्रथम) , 2019



ग़ज़ल लिखना चाहती हूँ...


तनुजा नन्दिता


               
किसी के इश्क़ में जलना चाहती हूँ
हर्फो से मिल ग़ज़ल लिखना चाहती हूँ...

सांझ ढले मंद बयार सा बिखर जाए
वफ़ा की यादो में बहकना चाहती हूँ...

सदियों से सजते रहे इश्क़ -ए -गुलिस्तां
हसरतो की राह से गुज़रना चाहती हूँ......

कभी कोई रूठे, खता हम भी करे
दिल का सुकूं ये समझना चाहती हूँ....

पाकर खोना जो खोकर पाना ज़िंदगी
तो बंदगी की चाह में मिटना चाहती हूँ....

सब्र गर तुम हो तो एतबार दिल का
शाम-ए-ज़िंदगी बन महकना चाहती हूँ....

नंदिता लफ्ज़ की बयानगी कहे ग़ज़ल
तुम्हारे बाहों के घेरे में सवंरना चाहती हूँ....!!
  

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