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वर्ष: 3, अंक 52, जनवरी(प्रथम) , 2019



अपने ही न थे


डॉ० अनिल चड्डा


 
इतने गैर तो तुम तब भी न थे
जब तुम हमारे अपने ही न थे।

फसानें दुनिया में बहुत हैं मगर,
उनमें अपने फसाने ही न थे।

इक जमाना हुआ उनको देखे हुये, 
इल्म हुआ, वो हमारे दीवाने ही न थे। 

यूँ तो गुफ्तगू होती रहती हैं उनसे,
दिल में प्यार के पर तराने ही न थे। 

भुला सकते नहीं उनका प्यार औ’गम भी,
ऐसे रास्ते तो हमने जाने ही न थे। 
 

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