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वर्ष: 3, अंक 52, जनवरी(प्रथम) , 2019



मातृत्‍व


डॉ विजेंद्र प्रताप सिंह


तीन बहनें गांव के किनारे अपने खेत में पशुओं के लिए चारा काटती हुई मग्‍न थी। सड़क पर ऑटो रिक्‍शा रूका । उसमें से निकले चार हिजड़े आए और लड़कियों से थोड़ा चारा देने को कहा। लड़कियों में से एक ने पूछा, क्‍या करोगी चारे का। एक हिजड़े ने उत्‍तर दिया, हमारी बकरी के बच्‍चों को खिलाएंगे। दूसरी लड़की ने पूंछा, तुम लोग बकरी क्‍यों पालते हो। हिजड़ा भावुक हो उठा और बोला.....ईश्‍वर ने हमें तो बच्‍चा जनने लायक बनाया ही नहीं। पालने के लिए कोई देता नहीं। बकरी जब बच्‍चे देती है हमें लगता है हमारे परिवार में भी नए मेहमान आए हैं और हम उनको पालकर......अपनी ममता की आग को ठंडा करने की कोशिश करते हैं,छोटी खुशी से ही खुश हो लेते हैं। ला....बहन, चारा....ला....मेरे घर बच्‍चे भूखे होंगे......कहते कहते आंखों में आंसू भर वह हिजड़ा ऑटो की ओर चल दिया। अन्‍य साथी भी भारी कदमों से पीछे चल दिए।


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