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वर्ष: 3, अंक 52, जनवरी(प्रथम) , 2019



हम दो हमारे दो


डॉ विजेंद्र प्रताप सिंह


अलीगढ़ शहर में नई बसी उच्‍च स्‍तरीय लम्‍बी और चौड़ी कॉलोनी में घूमते-घूमते वो और उसका ढोलकिया दोनों सुबह से दोहपर तक थक कर चूर हो पार्क के किनारे में पड़ी बेंच पर बैठ गए। भूख-प्‍यास से बुरा हाल। हिजड़ा गरियाने लगा.....हरामजादी ने ऐसा इलाका मुझे बेंचा.......ठग ले गई....लूट गई मुझे। हाय, री चंदा.....तू हिजड़ी होकर....एक हिजड़ी को चूना लगा गई। सुना था....इंसान एक दूसरे को लूटते हैं। हम में इंसानियत कितनी भी हो पर हम इंसान नहीं....हिजड़े हैं। हाय, करमजली, कीड़े पड़ेंगे तुझे। ढोलकिया बोली......सिम्‍मी....चंदा की गलती नहीं है। उसने हमें धोखा नहीं दिया है। धोखा तो इस इलाके का है। बड़े बड़े घर ....खूब पैसा....खूब समझदारी। बच्‍चे दो ही अच्‍छे। हम दो हमारे दो...........वाले लोग रहते हैं ऐसी कॉलोनियों में। यहां कुछ नहीं मिलेगा....कोई जानकारी भी नहीं देगा। इससे तो गरीबों की बस्‍ती ही अच्‍छी, जहां एक छोर से दूसरे छोर की खबर अपने आप मिल जाती थी। कम था उनके पास पर देते तो थे....खुश भी होते थे। नाच देखकर....। यहां ऊंची..... ऊंची अटारी पर जीवन पटारी है। चल नल पर पानी पी कर ही पेट की आग बुझाते हैं।


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