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वर्ष: 3, अंक 52, जनवरी(प्रथम) , 2019



बदलाव


सुरेश सौरभ


उसने कुंडी खटखटाई। अचकचाकर युवा किन्नर ने दरवाजा खोला, धड़ाक.. 'क्या है सुबह-सुबह दरवाजा क्यों पीटे जा रहे हो।'

'आप लोग आए नहीं हमारे यहॉ।'

'क्या करते आ के। बेटा होता तो आते।'

'यानी आप लोग भी बेटा बेटी में फर्क करते हैं।'

'ये फर्क तो आप लोगों ने ही पैदा किया । अगर बेटी होने पर नेग-न्योछावर देते रहते तो हम क्यों नहीं आते आप के यहां।'

'ठीक कहतें हैं । यह फर्क तोड़ने की मैं शुरूआत करता हूं। ये लो सौ रूपये।' किन्रर के हाथों पर धरते हुए, शाम को गाने बजाने आ जाना। मेरी बेटी बेटे से कम नहीं । इतना कहकर वह चल पड़ा। उसे जाता देख खामोशी से किन्नर सोचने लगा देश बदल रहा है या आदमी।


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