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वर्ष: 3, अंक 52, जनवरी(प्रथम) , 2019



मरने दो


राजीव कुमार


प्राइवेट अस्पताल के उद्घाटन होते ही मरीजों की बाढ़-सी आ गई। दर्द के कराहते मरीज, आग में झुलसे मरीज, सड़क हादसे में मरने से बचे मरीज और भी बहुत-सी बीमारियों के मरीज।

अस्पताल में डा. प्रमोद पांडेय ही सीनियर थे, जिनको तीस साल का अनुभव था, सब नौसिखिए थे।

केस बिगड़ता देख डा. शर्मा ने, डा. पांडेय से कहा, ‘‘सर, आपका चलना बहुत जरूरी है।’’

डा. पांडेय ने कहा, ‘‘डा. वर्मा को दिखा दो, वो तो तुमसे सीनियर हैं। वैसे भी मैं अपनी छुट्टी कैंसिल नहीं कर सकता। चाहे कुछ भी हो।

डा. पांडेय की बात सुनकर दो वार्डन आपस में बात करने लगे, ‘‘शर्मा जी और वर्मा जी के चक्कर में तो मरीज ऊपर पहुंच जाएगा।

दूसरे वार्डन ने तम्बाकू बढ़ाते हुए कहा, ‘‘अरे अपने को क्या करना है, सैलरी तो मिलेगी ही।’’

काल पर काल गए लेकिन डा. पांडेय के कान में जूं तक नहीं रेंगी। इन्डायरेक्टली वो यही कह रहे थे कि ‘‘मरने दो।’’

दो-तीन मरीज मर गए।

डा. शर्मा ने आश्चर्यचकित होकर पूछा, ‘‘पांडेय सर आपकी छुट्टी तो पांच दिन और थी, फिर आप यहां...?’’

‘‘हां, मंत्री जी का बेटा लल्लन आया है, न उसी के लिए आना पड़ा। और फिर ट्रस्टी का भी दबाव था।’’

डा. शर्मा ने कहा, ‘‘सर, उसको तो कुछ भी नहीं हुआ है, उसका इलाज तो मैं ही कर लेता।’’

डा. पांडेय ने कहा, ‘‘बड़े-अमीर लोगों का जीवन बच जाए तो अस्पताल की पब्लिसिटी।’’

एक आंख दबाकर कहा, ‘‘और अगर मर जाए तो बदनाम होकर भी प्रचार। बहुत मुश्किल से ही सही, मगर हर केस की तरह ये केस भी रफा-दफा।’’

डा. शर्मा ने आत्मग्लानि महसूस की और स्टाफ रूम की तरफ चल दिए।


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