Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 3, अंक 52, जनवरी(प्रथम) , 2019



जहर


राजीव कुमार


न जाने क्यों राहुल ने कौन-सी छोटी-सी बात को तिल का ताड़ बना लिया था। कौन-सी अच्छी बात ने उसके दिमाग तक आते-आते जहर का रूप ले लिया था।

‘‘इतना भी जिंदगी से कोई ऊबता है भला?’’ मां ने अपनी कसम देते हुए राहुल को कहा था।

मां की कसम देने के बाद और पिता के गुस्साने के बाद भी वो खुदकुशी के लिए उतारू था।

जहर तो उसने खरीद लिया था, मगर पीने का मौका न मिल पाने के कारण उसने भगवान से प्रार्थना की, ‘‘भगवान, मैं जीना नहीं चाहता, जहर पीने का मौका जल्दी मिले।’’

खुदकुशी के जुनून ने राहुल को आधी रात से उठाकर, चुपके से दरवाजा खुलवाकर बाहर तक ला दिया।

उसने जहर की बोतल खोलकर पीना चाहा तभी सांप ने डंस लिया। असहनीय दर्द को सहने के बाद राहुल को जीवन समझ में आया। जीने की तमन्ना जगी।

भगवान की मर्जी के बिना तो जीवन तो क्या मरण भी नहीं मिलता।

जहर की बोतल हाथ से छूटकर सांप के काटे स्थान पर गिर गई। जहर-जहर को काट गया। उसने जिंदगी से नाराजगी कभी नहीं दिखाई।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें