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वर्ष: 3, अंक 52, जनवरी(प्रथम) , 2019



स्त्री की पीड़ा


सुशील शर्मा


               
सीरिया की गोश्त की दुकानों पर 
टंगी हैं औरतें नंगी।
कटे हुए जिस्म के लोथड़े। 
दर्द से फफक उठते हैं ।
जख्मी जिस्म के अनगिनत घाव 
उनके शरीर पर रिसने लगते हैं । 
एकदम मूक और मौन।
खून में सनी औरतें और बच्चियां हैं । 
क्षतविक्षत और छलनी जिस्म हैं । 
ज़बरन गर्भवती होती स्त्रियाँ 
जो टायलेट में , तहख़ानों में ,खेतों में 
और छावनियों में घसीटी जा रही हैं ।
कुत्तों की तरह नोचतें हैं लोग उनको। 
धकेली जा रही हैं सरहदों के पार , 
बेची खरीदी जा रही हैं जानवरों की तरह । 
औरतें जो वहशियों से खुद को बचाने के लिये 
नदी में डूब रही हैं।  
जमीन में कब्र बनाकर छिप रही हैं। 
अनंतकाल से भोगती आ रहीं हैं 
अपने अस्तित्व में स्त्री होने का दंश। 
उर्मिला से लेकर निर्भया तक। 
न तो लक्ष्मण ने उर्मिला की सोची 
और न ही बुद्ध ने यशोधरा की। 
राम-रावण युद्ध से लक्ष्मण उभर गए 
तो बुद्धत्व को प्राप्त कर बुद्ध निखर गए। 
उर्मिला और यशोधरा का योगदान, 
उनकी पीड़ा व टीस से किसी को क्या मतलब।  
किसी ग्रन्थ किसी वेद में, 
नहीं हैं औरत की संवेदनाएं।  
सिर्फ तोहमत, 
द्रौपदी कारक है महाभारत की । 
सीता ने लक्ष्मण रेखा नाकी। 
अहिल्या ने पत्थर बन कर, 
भोगा देवत्व का श्राप। 
निर्भया रात को क्यों निकली ?
स्त्री का हंसना-बोलना, 
उसकी 'हां'- 'ना' सभी कुछ पुरुष तय करता है।
स्त्री का दम घुटता है आत्मा छलनी हो जाती है। 
जब पुरुष सब कुछ तय करने के बाद 
एक रोटी की तरह स्त्री को खा कर। 
स्त्री से पूछता है। 
तुम कैसी हो? 
तुम क्या चाहती हो? 
तुम खुश तो हो न? 
मैं तुम्हें खुश देखना चाहता हूं।
स्त्री से उसकी इच्छा, 
उसकी मर्जी या उसका मत कभी नहीं जाना जाता। 
वह क्या चाहती है, 
क्यों चाहती है 
और क्यों नहीं चाहती,
यह सब पुरुष पर ही निर्भर करता आया है। 
स्त्री सिर्फ शब्दों में ही देवी है। 
वास्तव में वह वेदी है 
जिसमें पुरुष एवं परिवार के लिए 
वह कर देती है अपने अस्तित्व को स्वाहा। 
   

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