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वर्ष: 3, अंक 52, जनवरी(प्रथम) , 2019



अपना घर


शम्भु प्रसाद भट्ट "स्नेहिल"


               
ये मेरा घर ये तेरा घर,
घरौंदा है यहाँ सब का।
घरों में ही सदा बसता;
सच्चा प्यार है मन का।।

कहते घर उसी को सब,
जहाँ बसती है माँ-ममता।
पाकर माँ की ममता को;
घर लगता है स्वर्ग जैसा।।

माँ-बच्चे की ममता का,
संजोया जाता है सपना।
जहाँ किलकारी बच्चों की;
वही प्यारा-सा घर अपना।।

बहन-भाई के प्यार की,
सदा बहती जहाँ गंगा।
वहीं मिलता है अपनों का;
हमेशा रहने को संगा।।

सदा आशीष मिलता हो,
जहाँ बच्चों को अपनों का।
वहाँ दाम्पत्य ऐसा हो;
पति-पत्नी में न हो झगड़ा।।

ताऊ-ताई, चचा-चाची,
सदा रहते जहाँ मिलकर।
उसी घर में उमड़ता है;
सुख-समृद्धि महासागर।।

जहाँ भी घर में मिलता है,
ददा-दादी का अपनापन।
लगता है न उस घर में;
कभी कोई परायापन।।

लगता घर वही अच्छा,
सदा हो प्रेम जहाँ सच्चा।
बिना अपनों के अपनेपन;
नहीं कोई भी घर अच्छा।।

चाहे हो घर कोई छोटा,
न हो प्यार का पर टोटा।
जहाँ शान्ति मिले मन की;
वही घर मन्दिर होता।।

करते प्रभु से विनती हम,
कृपा बरसे तेरी हरदम।
सभी का हो घर ऐसा;
जहाँ खुशियों का हो संगम।।
 

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