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वर्ष: 3, अंक 52, जनवरी(प्रथम) , 2019



वक़्त धुँआ धुँआ


सविता अग्रवाल “सवि”


               

वक़्त धुँआ धुँआ बन

उड़ रहा है

अविराम लहरों सा

चल रहा है

वक़्त बादलों सा

उमड़ रहा है

वक़्त आसमां में धूप सा

खिल रहा है

क्षितिज में जाकर

छुप रहा है

न कोई रोक पाया है

वक़्त की गति को

यह तो निरंतर पानी सा

बह रहा है

वक़्त धुँआ धुँआ उड़ रहा है

यह वर्ष भी अपने अंतिम दौर से

गुज़र रहा है

कितने उम्मीदें हैं नव वर्ष से

पर वह भी हर दिन

चलता ही जायेगा

कभी बदरी सा छाएगा

कभी बरसात बन बरसेगा

पूरे वर्ष नई नई घटनाओं से

अवगत कराएगा

फिर धुँआ धुँआ उड़ कर

काल चक्र में समा जायेगा

जो वक़्त चला गया

वह फिर वापिस नहीं आयेगा

बस तारीखें बदलती रहेंगी यूँ ही

वक़्त अपना अस्तित्व खोकर

खट्टी मीठी यादें छोड़ जायेगा

वक़्त धुँआ धुँआ बन

उड़ रहा है

और धुँआ बन

उड़ता ही जायेगा |

      
   

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