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वर्ष: 3, अंक 52, जनवरी(प्रथम) , 2019



सूरज की पहली किरण से


रामदयाल रोहज


              
सूरज ने अपनी झोली से
फेंकी पहली किरण सुनहरी
निकल पङा मैं अपने घर से
प्रकृति के दर्शन करने
टेढे मेढे कच्चे रस्ते
धूल भरे; अजगर से लम्बे
दोनों तरफ सजी बाङें
वल्लरियों के मासूम फूलों से
टंगे हुए है पेङों पर
लो बीन से सुन्दर महल बया के
खङा बाजरा बाँध के सहरा
ज्वार बनी है दुल्हन रसीली
खेत मंडप बना हुआ
दोनों का हथलेवा मनोहर
और नरमें की फसल में
आ गई जैसे दिवाली
जगमगाते है दीये से
अनगिनत दुग्ध ध्वल फाहे
ताम्र तीरों से सधे प्रसून
एलोवेरा के कर में
रोग रावण को हराने
हो गया तैयार है
और टीलों ने पहन ली
तुम्बे की बेलों की माला
पीत कंदुक से फलों से
खेलते शुक बीज खाते
इधर से बाजा बजाते
आ रही कूंजों की टोली
पंख फैलाकर यहाँ
ठिगने चनों में आ जुटी
कर लिए सिंगार घग्घर है
लता भूषण कई
सूखकर भी है हरी
फूलों से मार्ग सी सजी
 

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