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वर्ष: 3, अंक 52, जनवरी(प्रथम) , 2019



जीवालय


रामदयाल रोहज


              
पर्यावरण का चौकस रखवाला
धरती का सिंगार निराला
गिरि शिखर से होङ लगाता
सुख शांति का अलख जगाता
उद्योगों के पापों को धोता
गिरते यहाँ गिरि से सोता
खेल रहे बंदर डालों पर
उतर रहे बादल ढालों पर
पेङों से चमगादङ चिपके
घूम रहा मैं चुपके चुपके
हाथी झुँड चिघाङ रहा
सारस स्वर हवा फाङ रहा
कठफोङा का मंगल ढोल
बरसाते मधु कोयल बोल
चरचरियों के लम्बे गीत
तितली लाल गुलाबी पीत
गीदङ को सुनकर गीदङ बोले
जब आँखें चन्द्रमा खोले
कम्बल ओढे रींछ घूमते
चील बाज आकाश चूमते
'वी'बन जाता बगुले उङते
रोज नकुल सर्पों से लङते
गोह गोहरा भी ठाट से रहते
गिरगिट पल पल रंग बदलते
पिक वायस की यहाँ खींचतान
निकला सुअर झुंड से नादान
टोली हिरनों की मौन मस्त
खरगोश खेल में हुए व्यस्त
अजगर आलस में पङे हुए
नाहर चौकस है खङे हुए
केहरि की इधर दहाङ सुनी
है पलक लगाए ऋषि मुनि
नृत्य सा करती छिपकलियाँ
यौवन में मचलती नवकलियाँ
सारस जलमुर्गी कमल कोक
जंगली जीवालय जंगल लोक
 

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