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वर्ष: 3, अंक 52, जनवरी(प्रथम) , 2019



अजन्मा प्रतिकार


राजा सिंह


 
मेरे भीतर ,
जन्म ले रहा है एक भ्रूण.
इसका पालन पोषण 
मेरा शरीर नहीं ,
वरन करता है 
मेरा कुंठित मन ,
और 
कुंठित मन का अधार है 
बेकारी, भुखमरी,भ्रष्टाचार 
और अन्याय तथा शोषण का 
फैला हुआ साम्राज्य.
अगर हालत यही रहे तो 
भ्रूण बनेगा  शिशु ,
और शिशु से जवान ,
जो फिर 
शब्द न देकर 
देगा रक्त या लेगा रक्त ,
इस असहनीय व्यवस्था का.
इससे व्यवस्था 
टूटे या न टूटे, मगर 
एक गूंज होंगी 
जो इस देश की 
गूंगी,बहरी,एवं अंधी 
सत्ता सुनेगी ;
और महसूस करेगी 
इस देश की 
शोषित मानवता 
अपने शोषण को .
 

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