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वर्ष: 3, अंक 52, जनवरी(प्रथम) , 2019



कापुरुष


राजा सिंह


               
मै अक्सर 
कुछ न कह पाता हूँ 
न कर  पाता हूँ  .
मै तब भी –
कुछ नहीं कह पाया था 
जब मेरे बाप ने 
मेरी प्रेमिका को वैश्या कहा था ,
और मेरे शरीर का लहू 
पोरों में उतर आया था 
बाप का गला टीप देने के लिए .
मगर मै 
ऐसा न कर सका 
रह गया था सिर्फ खून का घूंट पीकर .
मै तब भी 
कुछ न कह पाया था 
जब मेरी प्रेमिका ने कहा था 
तुम अपने बाप के प्रति 
कुत्ते जैसे वफादार हो 
और मेरे लिए नामर्द के अवतार,
सिर्फ बेबसी से –
एकांत में आकर
जार जार रोया था .
मै तब्ब भी 
 कुछ नहीं कर पाया था 
जब मेरे बाप ने 
मेरे से आठ साल बड़ी औरत से 
मेरी  शादी कर दी ,
अपनी झूँठी शान और 
असली पैसो के लालच में ,
सिर्फ बलि के बकरे की तरह 
जिबह हो गया था .
और मै अब भी 
कुछ नहीं कर पाता हूँ,
जब मेरे बच्चे अधनंगे होकर 
अंग्रेजी धुन पर 
कमर मटकाते है ,साथ में 
बुढढे का दिमाग फिर गया है ,
कहकर घुड़की देते है ,
मै उन्हें सिर्फ
टुकुर टुकुर ताकता रह जाता हूँ 
 

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