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वर्ष: 3, अंक 52, जनवरी(प्रथम) , 2019



तुम्हारे प्रेम में


पवनेश ठकुराठी ‘पवन‘


               
समुद्र में जैसे उठती है लहर
वैसे ही मेरे मन में 
तुम्हारे लिए
उठती है चाह।
पल-पल प्रतिपल
तुम तक पहुंचने की
इस चैराहे से निकलती हैं
कई राह।
तुम्हारी अनुपस्थिति में गूंजती हैं
अनवरत सिसकियां
अनगिनत आह।     
   

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