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वर्ष: 3, अंक 52, जनवरी(प्रथम) , 2019



एकाग्रता


पवनेश ठकुराठी ‘पवन‘


               
हवा चलती है तो हिलती है पत्ती
तुम आईं तो हिली मेरी पलकें
और टिक गईं तुम पर
तूफान आया
बारिश हुई
ओले बरसे
बर्फ गिरी 
और भी न जाने क्या-क्या हुआ
लेकिन मेरी पलकें
अभी भी टिकीं हैं तुम पर।    
   

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