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वर्ष: 3, अंक 52, जनवरी(प्रथम) , 2019



आँखें


नवीन कुमार भट्ट


 
आँखें बुलाती है।
आँखें सुलाती है।।
हुये बे पर्दा अगर,
आँखें रूलाती है।।
प्रेम की वेदनाएँ,
आँखेें सुनाती है।।
चाहते है गहरी,
आँखें सुझाती है।।
चेहरे की रौनक,
आँखे चुकाती है।।
तड़पती तरसती,
आँखे दुखाती है।।
झुकता तभी जब,
आँखें झुकाती है।।
छुपता नहीं कभी,
आँखें छुपाती है।।
रूके से रूके नहीं,
आँखें रूकाती है।।
 

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