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वर्ष: 3, अंक 52, जनवरी(प्रथम) , 2019



नन्हीं सी लौ


कवि जसवंत लाल खटीक


 
अब लिख नहीं पा रहा हूँ मैं ,
ये कलम बहुत डगमगाती है ।
आँखों संग कलम भी रोती है ,
बहन-बेटियां जलाई जाती है ।।
कैसे लिखूं मैं वह दर्द जो सिर्फ , 
महसूस ही किया जा सकता है ।
तेरे को जिंदा जला दिया बहन , 
ऐसा कैसे , कोई कर सकता है ।।
रोज-रोज बलात्कार हो रहे ,
बहन हम सब बहुत शर्मिंदा है ।
कभी मारा तो कभी जलाया ,
पर गुनाहगार अभी जिंदा है ।।
कातिल यहाँ सुरक्षित है पर ,
बेटियां डर डर कर जीती है ।
एंटी रोमियो भी चल रहा पर ,
बेटियां खून के आँसू पीती है ।।
गाय कटने की अफवाह से , 
सारा बुलन्दशहर जला दिया ।
आगरा क्यूँ सोया है अबतक ,
जब एक बेटी को जला दिया ।।
आँखों में अश्रु की धारा लिये ,
मेरी रूह हर पल काँप रही ।
क्यों नहीं काँपे उनके हाथ जब ,
संजली अपनी मौत भांप रही ।।
सूरज के ताप से बचती थी ,
पेट्रोल से जिंदा जला दिया ।
कुछ तो रहम करते कुत्तों ,
फूल को तुमने कुम्हला दिया ।।
इतनी हिम्मत कहां से लाये ,
इंसानियत को ही भुला दिया ।
कुछ तो शर्म करते भेड़ियों ,
नन्हीं सी लौ को बुझा दिया ।।
ऐसे वहसी दरिंदो को " जसवंत ",
चौराहे पर उल्टा लटका दो ।
जब तक सांस ना टूटे तब तक ,
शरीर से सारी चमड़ी हटवा दो ।।
 

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