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वर्ष: 3, अंक 52, जनवरी(प्रथम) , 2019



घर की और !


गुरुदेव प्रजापति


 
सुबह का 
थका-हारा,भूखा,बेबस,मायूस.....

राह देखता हुँ
शाम होने की
 घर पहुंचने की.....

पूरा दिन 
भटकता रहता हुँ
यहाँ-वहाँ,ईधर-उधर,जहाँ-तहाँ.....
न जाने क्युँ?
और फिर
चल पडता हुँ
घर की और.....

सोचता हुँ कि
मेरा  घर कहाँ है?
घर है भी या नहीँ?
घर में कौन रहता है?
कोई रहता है भी या नहीँ?
क्या पता !

फिर भी न जाने क्युँ?
शाम होते ही
चल पडता हुँ
अपने 
घर की और !
 

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