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वर्ष: 3, अंक 55, फरवरी(द्वितीय) , 2019



बचपन


डॉ० शिल्पी श्रीवास्तव


 

इस जग में सब कुछ बिकता है,यहाँ रिश्ते भी अनमोल नहीं,
पर बचपन तो बचपन ही है,जहाँ खुशियों का कोई मोल नहीं;
        अपनी बातें ही  सच लगती,सपनों के महल बनाते हैं,
        राजा-रानी का खेल सही,खुद राजा तो बन जाते हैं!
छोटी सी इनकी दुनिया में,ऊँचे-नीचे का भेद नहीं,
यह बचपन तो बचपन ही है,जहाँ खुशियों का कोई मोल नहीं;
        पल में कटुता-पल में मैत्री,लड़ना-भिड़ना तो खेल लगे,
        अपने ही प्यारे मित्र के सिर,गलती मढने में ना देर लगे;
पर ज्यों ही गुस्सा शांत हुआ,मित्रता भाव में देर नहीं,
यह बचपन तो बचपन ही है,यहाँ खुशियों का कोई मोल नहीं;
       पर कुछ बचपन ऐसे भी हैं,जहाँ 'बचपन' खुद पर रोता है,
       घर की रोटी के जुगाड़ में,वह ईंटा-पत्थर ढोता है;
उनको भी छोटी खुशियों में,खुश होने में परहेज नहीं,
वह बचपन भी बचपन ही है,जहाँ खुशियों का कोई मोल नहीं ।
  

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