Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 3, अंक 55, फरवरी(द्वितीय) , 2019



बेचारे टीले


रामदयाल रोहज


    
कनक रेत है चमक अपार
छूते नभ टीले लहरदार
कुछ कच्छप से महाकार
कुछ बने हुए अर्द्धचन्द्राकार
उङती आलोकित रेत इधर
ज्यों बरस रहा स्वर्ण भू पर
ज्यों तारक शिशु रहे उतर
नभ झुका शिशु लेने सुन्दर
लघु लघु शंख चहुँओर पङे
मानो साधक कहीं और चले
घनसुता कुंवारी आती है
दिल जीत ना इसका पाती है
करली प्रतीज्ञा बने भीष्म
सावन में भी सहना ग्रीष्म
श्रंगालों में क्रंदन होता
जैसे शिशुदल भूखा रोता
अंबर-दरखत की है छाया
है गर्म खूब, कैसी माया
गोङावण गुरबत करते है
कौए हुँकारा भरते है
विषधर ने ताक लगाया है
झट से चूहे को खाया है
तीतर स्वर मिश्री सी घोले
आँधी के मृदंग से बोले
जीवन को कण-कण तरस रहे
संकट के बादल बरस रहे
जल रहे पाँव,चेहरे ढीले
निज ठौर बदलते है टीले

शब्दार्थ-गुरबत=बातचीत
 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें