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वर्ष: 3, अंक 55, फरवरी(द्वितीय) , 2019



प्रकृति माता


रामदयाल रोहज


    
हेम मुकुट घन का सुन्दर
लोचन-रवि चाँद चमकते है
आलोक-दृष्टि मंगलमय
सब ईहा पूर्ण कर सकते है
मुस्कान कुसुम-अधरों में है
हिम शिखर दान्तों की पाँती
चेहरे से शतत् बरसती है
सुख की बूंदे,अद्भुत शांति
पर्वत-स्तनों से मधुर पय
नदियाँ बन धार निकलती है
सवा सौ कोटि संतान जिसे
पीकर ही पलती फलती है
अन्न जीवन फल वायु मेवे
है एक हाथ से बाँट रही
दूजे से  दुआएँ  देती  है
आफत-फंदे को काट रही
 

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