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वर्ष: 3, अंक 55, फरवरी(द्वितीय) , 2019



मृत्यु भोज - एक अभिशाप


कवि जसवंत लाल खटीक


 
मृत्यु भोज खाना , बंद करो सब ,
एक बात मेरी , आप लोग  मानलो ।
अरे ! मृत्युभोज एक अभिशाप है दोस्तो ,
आज से ही बंद करो , दिल से ठानलो ।।
मृत्यु भोज एक .............

अरे ! मौत होना  , खुशी की बात नहीं ,
जो तुम लड्डू और पेड़े बड़े चाव से खा रहे ।
घर में अंधेरा हुआ , नहीं कोई उजियारा ,
फिर क्यों दोस्तों , मृत्यु भोज खा रहे ।।
मृत्यु भोज एक......

अरे ! जिंदा था तब तो चाय भी नसीब नहीं ,
अब देखो  दूध की नदिया बहा रहे ।
भूख से ही गयी थी उस आदमी की जान  ,
आज देखो मिठाईयो की कतारे लगा रहे ।।
मृत्यु भोज एक .....

एक बार दिल से सोचो मेरे दोस्तों ,
किस घर का हम खाना आज खा रहे ।
अरे जिस घर में टूटा , दुःखो का पहाड़ फिर
दुःख में  चिनगारी हम क्यों लगा रहे ।।
मृत्यु भोज एक ....

कुछ तो शर्म कर लेते मेरे दोस्तो ,
दुःख में पाँच पकवान कैसे भा रहे ।
किसी की टूटी चूड़ी , किसी की आस यहाँ
फिर सज धज के कैसे जीमने जा रहे ।।
मृत्यु भोज एक.....

बेटे के सर से उठ गया साया फिर ,
उस पर कर्ज का बोझ क्यों डाल रहे ।
अरे ! पढ़ाई की उम्र में , पसीना बहायेगा वो ,
नन्ही सी जान पर क्यों सितम यूँ  ढा रहे ।।
मृत्यु भोज एक ....

अगर करनी हो , मेहमानों की मेजबानी ,
सिर्फ सादा खाना उनको मान से परोस दो ।
शोक है घर में , शौक मत बनाओ तुम ,
मृत्यु भोज में मीठा भोजन तुम छोड़ दो ।।
मृत्यु भोज एक ......

अरे ! हमसे अच्छे तो वो जानवर है जो ,
अपनो के वियोग में खाना पीना तजते ।
इंसान हो थोड़ी बहुत इंसानियत निभाओ तुम ,
मृत्यु भोज के क्यों ख़्वाली पुलाव सजते ।।
मृत्यु भोज एक .......

हाथ जोड़ अर्ज करूँ मैं , समाज वालों ,
एक बात मेरी  , आप लोग सब मानलो ।
मृत्यु भोज एक अभिशाप है समाज का ,
आज से ही बंद करो , दिल से ठानलो ।।
मृत्यु भोज एक .......
 

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