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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



मधुमास


सुशील कुमार शर्मा


 

ऋतु वसंत है आसपास। 
स्वप्निल गुंजित-मधुमास।
तुंग हिमालय के स्वर्णाभ शिखर।
अरुणिम आभा चहुँ ओर बिखर।
 नव्य जीवन का रजत प्रसार। 
मधुकर सा गुंजित अपार। 
सुरभित मलयज मंद पवन.
नील निर्मल शुभ्र गगन। 
मृदु अधरों पर मधुआमंत्रण। 
नयनों का है नेह निमंत्रण। 
बासंती सोलह सिंगार।
सतरंगी फूलों की बहार।
पीत  पुष्प आखर से। 
उपवन हैं बाखर से। 
शतदल खिली कमलिनी।
गंधित रसवंती कामिनी। 
कम्पित अधरों का मकरंद।
किसलय कम्पित मन के छंद। 
मंजरियों में बौराई आमों की गंध 
अभिसारी गीतों में प्रेम के आबंध। 

हरा भरा पर्यावरण ,धरती माँ का स्वर्ग। नदियां कल कल जब बहें ,सुखी सभी संवर्ग। सौर ऊर्जा का विकल्प ,जीवन का आधार। संसाधन सब चुक गए ,किया न कभी विचार। शास्वत नभ में उड़ गया ,सपना सुघड़ अमोल। हरी भरी धरती रहे ,पर्यावरण सुडोल। पुलकित पंखों से उडी ,गोरैया इस बार। जाने कहाँ वो खो गई ,दिखी नहीं इस पार। सूखी नदियां कर गईं,मुझसे कई सवाल। रेत को हम क्यों बेचते ,जेब में भरें माल। पेडों को पानी नहीं ,मानव भूखा सोय। जंगल अब बचते नहीं,बादल सूखा रोय। उजड़े उजड़े से लगें ,मेरे सारे गांव। वीरानी बैठी हुई,उस बरगद की छांव। कोयल गौरैया नही ,गाय नही घर आज। कुत्ता गोदी में धरे ,जाता कहाँ समाज। माँ की आँखे देखती ,एक टक रास्ता आज। वो बेटा कब दिखेगा ,जिस पर उसको नाज। सूरज ठंडा सा लगे ,चांद ढूंढता रूप। पानी प्यासा सा फिरे,आग निहारे धूप। जंगल पर आरी चले ,नदी तलाशे नीर। जीवन सांसे ढूंढता,घाव निहारे पीर। पर्यावरण की सुरक्षा ,है पावन संकल्प। प्रकृति शरण में वास का ,बचता सिर्फ विकल्प।

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