Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



सपना


संतोष कुमार वर्मा


  

सपने वो अक्सर  टूटे  मेरे 
जिसे मैं बड़े मन  से 
पूरा  करना  चाहा 
अब  सपना  मेरा 
कुछ रहा ही नहीं 
समय  आया और  
रुका  ही नहीं 
पर देखता  हूँ मैं 
अक्सर लोग रुके रहते हैं 
किसी  न  किसी  के लिए 
जो  नहीं बढ़ना  चाहते  आगे 
क्यों रुके रहते  हैं वो 
उसी  के  लिए 
मैं ऐसे लोगो  को भी 
देखता हूँ 
जो नही  रुकते 
कभी  किसी  के लिए 
और  उन्हें बढ़ते  भी देखा 
आज  यहाँ  तो कल वहाँ 
गलती मेरी  है ?
कि मैं  बढ़ नहीं पाया 
या उन  लोगो  की 
जिनके कारण मुझे 
बढ़ने  नहीं दिया गया ?
सिर्फ इसलिए 
क्योंकि। ... 
उसे  पता है 
कल  चार और 
इसके  जैसा  आ जायेंगे 
फिर  हमें  किसके  द्वारा  पूछा  जाएगा ?
इसी  तरह  काबिलियत दबती है 
और  कोख  में  घुट घुट  मरती  है 
सपने  यूं ही तो ,
चुर -चुर होते है
कोई करना  चाहता  है  बयां 
पर कुछ और करने के लिए 
मजबूर होते है 
मजबूरियों को दूर करना है
काबिलियत  को मशहूर  करना है 
खामोशियाँ  ले लेगी जान  हमारी 
भ्रष्ट्राचारियों के विरुद्ध 
अपना आवाज़  बुलंद करना है I 
 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें