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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



मेरे शब्द


हरदीप सबरवाल


 
	
शब्दो को बुनना 
अक्सर संगीतमय होता है 
झील मे उठती जल-तरंगो से बजते 
कभी पर्वतो मे उठती प्रतिध्वनियो से कोमल 
मंदिर में ईश्वर को अर्पित घंटियों से मधुर 
कभी विज्योत्सव में बजते ढोल-मृंदग से चंचल, 
आशा का संचार करते 
ये बुने हुऐ शब्द 
जोड़ते रिश्तो को 
सुरो में पिरोते 
पर मेरे शब्द 
बिखरे पड़े है यहां तहां 
कमरे के फर्श पर 
टेबुल पर पड़ी किताबो के पीछे 
तुम्हारी चप्पलो के पास 
दरकते हुऐ ये अनकहे शब्द 
मेरे वजूद और हमारे रिश्ते जैसे 
रोज एक उधेड़बुन में 
इन्हे बुनता हुं और उधेड़ता हुं 
पर कभी कोई सुर नहीं निकाल पाया 
सिवाय एक रूदाली के रूदन के . 
 

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