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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



खुली किताब


सतीश राठी


वह सदैव अपनी पत्नी से कहता रहता कि , ‘’ जानेमन ! मेरी जिन्दगी तो एक खुली किताब की तरह है ...जो चाहे सो पढ़ ले | ’’ इसी खुली किताब के बहाने कभी वह उसे अपने कॉलेज में किए गए फ्लर्ट के किस्से सुनाता , तो कभी उस जमाने की किसी प्रेमिका का चित्र दिखाकर कहता – ‘’ ये शीला ...उस जमाने में जान छिड़कती थी हम पर....हालाँकि अब तो दो बच्चों की अम्मा बन गई होगी | ‘’

पत्नी सदैव उसकी बातों पर मौन मुस्कुराती रहती | इस मौन मुस्कुराहट को निरखते हुए एक दिन वह पत्नी से प्रश्न कर ही बैठा --- यार सुमि ! हम तो हमेशा अपनी जिन्दगी की किताब खोलकर तुम्हारे सामने रख देते हैं , और तुम हो कि बस मौन मुस्कुराती रहती हो | कभी अपनी जिन्दगी की किताब खोलकर हमें भी तो उसके किस्से सुनाओ | ’’

मौन मुस्कुराती हुई पत्नी एकाएक गम्भीर हो गई , फिर उससे बोली ---‘’ मैं तो तुम्हारे जीवन की किताब पढ़ – सुनकर सदैव मुस्कुराती रही हूँ , लेकिन एक बात बताओ ....मेरी जिन्दगी की किताब में भी यदि ऐसे ही कुछ पन्ने निकल गए तो क्या तुम भी ऐसे ही मुस्कुरा सकोगे ? ‘’

वह सिर झुकाकर निरुत्तर और मौन रह गया |


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