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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



आटा और जिस्म


सतीश राठी


दोनों हाथ मशीन में आने से सुजान विकलांग हो गया | नौकरी हाथ से गयी |

जो कुछ मुआवजा मिला वह कुछ ही दिनों में पेट की आग को होम हो गया |

रमिया बेचारी लोगों के बर्तन माँजकर दोनों का पेट पाल रही थी |

पर ... आज ! आज स्थिति विकट थी | दो दिनों से आटा नहीं था और

भूख से बीमार सुजान ने चारपाई पकड़ ली थी |

सुजान की वीरान आँखों में उगे प्रश्न एवं भूखे पेट से निकली कराहटें

रमिया सहन नहीं कर पा रही थी |

मन में कुछ सोचकर वह झोपड़ी से बाहर जाने लगी तो सुजान पूछ बैठा – ‘’ कहाँ जा रही है रमिया ? ‘’

‘’ देखूँ ! शायद बनिया तरस खाकर कुछ उधार दे दे | ’’ ठंडे स्वर में रमिया बोली थी |

कुछ समय बाद अस्त – व्यस्त रमिया कुछ आटा लाई और पुरानी परात में उसे गूंधने लगी | कराहते हुए सुजान को उस गूँधे हुए आटे में और पत्नी के जिस्म में कोई फर्क नहीं लग रहा था |


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