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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



आघात


राजीव कुमार


आसमान में बादलों की गड़गड़ाहट और तेज हुई। सुमन छत पर ही सोया हुआ था। उसने प्रण कर लिया कि चाहे जो भी हो, बरसात की पहली बूंद में थोड़ा-सा भीगने के बाद ही कमरे में सोने जाऊंगा। वो चटाई पर ही लेटा रहा, लेकिन गड़गड़ की आवाज से नींद कहां आने वाली थी। सुमन उठा और छत के एक कोने पर जाकर अपने कमरे में झांका तो उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। बरसात तो हो चुकी थी।

दूधिया रोशनी के कारण स्पष्ट नजर आ रहा था कि मेरा चचेरा भाई, मेरी बीबी के साथ प्रेम की वर्षा में भीग रहा है। दोनों निर्वस्त्र, निढाल पड़े हैं।

सुमन का मन किया कि छत से ही सिर के बल कूद जाए, फिर जाकर चटाई पर लेट गया।

सारी रात मूसलाधार घनघोर बारिश में सुमन भीगता रहा।


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