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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



पूजा


महेन्द्र देवांगन "माटी"


आज मंदिर में बहुत भीड़ थी । सभी लोग केला , संतरे, अंगूर, सेव, चूड़ी, फीता , चुनरी और न जाने क्या क्या सामान माता जी को चढ़ा रहे थे ।

पुजारी जल्दी जल्दी सबके सामान को लेकर रख रहे थे और प्रसाद दे रहे थे ।

मंदिर के बाहर कुछ भिखारी बैठे हुये भीख मांग रहे थे । मंदिर में आने वाले दर्शनार्थी नाक भौं सिकुड़ते हुए आगे बढ़ जाते थे ।

तभी एक चमचमाती हुई कार से एक महिला आई । वह भी माता जी को चढ़ाने के लिए फल , फूल और सामान लाई हुई थी । मंदिर के पास जाते ही भिखारी अपने हाथ फैलाने लगे ।

वह महिला ठिठक गई और कुछ सोचने लगी । फिर उसके बाद वह जितनी भी सामान और फल फूल लाई थी सबको बाँट दी , फिर मंदिर की ओर आगे बढ गई ।

उसके साथ आई उसकी सहेली बोली --- आप तो सभी चीजों को भिखारियों में बाँट दी अब मंदिर में क्या चढ़ायेगी ?

वह बोली -- मंदिर में तो सभी लोग चढ़ा रहे हैं । वैसे भी माता जी उसे खायेगी नहीं । मैं तो यहाँ बैठे हुए साक्षात देवियों को खिला दी । मेरा मन संतुष्ट हो गया । अब माता जी को सिर्फ प्रणाम कर लूंगी ।

सभी लोग आश्चर्य से उस महिला की ओर देख रहे थे , और मन ही मन तारीफ भी कर रहे थे ।


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