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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



सरदी की धूप


रामदयाल रोहज


 
सरदी की अब धूप खिली
सबसे हिल मिलकर गले मिली
भर बाँध लिए धुँध से झोले
दुबके बगुलों ने पर खोले
घूरों से निकल गए कूकर
खिल गया गात रवि कर छूकर
खुल गया गगन का निर्मल पथ
निकला सूरज ले अपना रथ
जन धूप सुहानी लूट रहे
कन्धों से कम्बल छूट रहे
शिखरों की चमक उठी आँखें
खगकुल ने खुजलाई पाँखें
चौसर चौपालों पर सजता
आनन्द यहाँ नीरव तजता
हरी घास पे सतरंगे मोती
हंसों में प्रेम क्रीङा होती
नावें नदियों में उतर चली
नृत्य करती आ लहर मिली
चौपाये चरने चले घास
फसलों ने राहत की ली साँस
सरदी के शान्त हुए तेवर
जुट गया काम में खेतिहर

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