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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



ये मेंहदी


नवीन कुमार भट्ट


 
हाथों का श्रंगार ये मेंहदी।
बाबुल का प्यार ये मेंहदी।।

जैसे - जैसे ये गहरी होती,
बनें प्रीत कि हार ये मेंहदी।।

मेंहदी हाथों में शोभित हो,
दे जाती आकार ये मेंहदी।।

दो दिल में जान सी रहती,
रंगो की बौछार ये मेंहदी।।

खुशियों की सौगाते बाँटे,
होती ना लाचार ये मेंहदी।।

प्रीत पलों को महकाती ये,
मान रही आभार ये मेंहदी।।
 

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