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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



मैं मस्त फकीर


मुकेश कुमार ऋषि वर्मा


 
मैं मस्त फकीर 
मेरा कोई नहीं ठिकाना 
मुझे नहीं पता 
कल कहाँ जाना ?
अपनों ने मुझे भुलाया 
मैंने भी अपनों का मोह मिटाया |
छोड़ के सारा झमेला, 
मैं चला अकेला ||
मान मिले या अपमान मिले 
सब मन से स्वीकारूंगा 
इस झूंठे संसार में रहके 
धूनी कहीं रमाऊंगा?
धन-दौलत का साथ मिले 
पल दो पल का 
मैं सृष्टि रचईया के गुण गाऊंगा, 
उसकी भक्ती में ही पागल हो जाऊंगा |
जग की चालों से बिल्कुल उलटा चलकर 
राह नई बनाऊंगा 
मैं निबलों-बिकलों का बनकर सहारा 
मानवधर्म निभाऊंगा ||
  

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