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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



रोको अन्याय के धारों को


लीला तिवानी


          
मत रोको इन बरसातों को 
दो भीगने तन-मन-प्राणों को 
माना कपड़े गीले होंगे 
सड़कों के नट ढीले होंगे 
हिल जाएंगी नदियों की दाढ़ें भी 
आएंगी कुछ-कुछ बाढ़ें भी 
पर सींचेंगी भू के तारों को 
सींचेंगी सूखे-ख़ारों को 
आने दो अब बरसातों को 
मत रोको इन बरसातों को। 

मत रोको अश्रुधारों को 
होने दो तरल मन-तारों को 
ये रुककर हिमकण बन न सकें 
ये रूप बांध का ले न सकें 
फिर लेंगे रोक ये भावों को 
अंतरतम के प्रस्तावों को 
बाधित न करें दिल-तारों को 
नियंत्रित न करें शुभ भावों को 
बहने दो अश्रुधारों को 
मत रोको अश्रुधारों को। 

मत रोको रहमत-धारों को 
प्रभु की आशीष के तारों को 
इनसे झंकृत तन-मन कर लो 
आशीषों से झोली भरलो 
हरो दीन-दुखी की विपदाएं 
करो दूर कंटीली बाधाएं 
फिर प्रभु तुमको हर्षाएंगे 
रहमत-धारे बरसाएंगे 
झरने दो रहमत-धारों को 
मत रोको रहमत-धारों को। 

रोको अन्याय के धारों को 
पथ-अनय पे चलने वालों को 
रोका न गर तो दुख होगा 
सुख का पथ फिर बाधित होगा 
जीवन में अंधेरा छाएगा 
रवि ज्ञान का फिर छिप जाएगा 
मत झेलो इनके वारों को 
छिड़ने दो न्याय के तारों को 
मत रोको न्याय-उजालों को 
रोको अन्याय के धारों को , 
रोको अन्याय के धारों को.
 

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