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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



स्वगत


अनीता शर्मा


  
मैंने उनसे, उनने मुझसे
प्रश्न बस इतना किया।
कौन होते हैं ये 'अपने'
इनका पता दे दो जरा।।

अपनों ने हमें, हमने उन्हें
जाने कब रुखसत किया।
समय-चक्र चलता रहा
पर जान ना पाया जिया।।

होश कब आया हमें
या कि बेसुध ही रहे।
ये नियति का है चक्र 
या कर्म जो हमने किए।।

समझा सके अपनों को ना
ये हमारी ही कमी थी।
कि उन्हीं अपनों के ग़म में
आँखों में मेरे भी नमी थी।।

मान-सम्मान जाना न मैंने
अपनों को अपना ही माना।
क्या पराई आस देखे 
अपने जिसे कर दे बेगाना।।

ये समझ ही ना सके हम
कौन है अपना-पराया।
हाँ! हुआ फिर से वही
पर अपना हुआ, अपना पराया।। 

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