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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



कोई ये बात बताए


अनिरुद्ध सिन्हा


 
कोई ये बात बताए  भी उस सितमगर को 
हमारा दिल भी  है  तैयार उसके खंज़र को 

सवाल ये नहीं तुमको मिला  है क्या घर से 
सवाल ये है कि तुमने दिया है क्या घर को 

तमाम  उम्र  तबाही   की  तंग  बस्ती में 
फ़रेब  रोज़  ही   देता  रहा  मुकद्दर  को 

हवस की ज़िद में उठे पाँव का भरोसा क्या 
हवस की ब चाह ने अंधा किया सिकंदर को 

न जाने हाँफते लम्हों ने क्या दिया  उसको 
कि अब वो फाड़ रहा है  नए  कलेंडर  को 

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