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वर्ष: 3, अंक 54, फरवरी(प्रथम) , 2019



दोहे


राजेन्द्र वर्मा


  
पंचतत्त्व से है बना, यह अनमोल शरीर ।
इसमें ही बैठा हुआ,  पीरों का भी पीर ।।
 
काया माटी-सी चढ़ी, कुम्भकार के चाक ।
गीली मिट्टी घूम-फिर,  हो जाती है ख़ाक ।।
 
अपने अन्दर झाँककर, देखो तो इक बार ।
अगर बुलावा आ गया, क्या तुम हो तैयार?
 
अपनों से तो जीत भी, लगती जैसे हार ।
जीत लिया खुद को अगर, जीत लिया संसार ।।
 
इधर उड़ा पंछी, उधर, सभी हो गये दूर ।
अपने भी अपने नहीं, दुनिया का दस्तूर ।।
 
एक दिवस है आदि तो, एक दिवस है अन्त ।
दो दिवसों के मध्य में, जीवन भरा अनन्त ।।
 
राजा, मन्त्री, आमजन, पशु, पक्षी नायाब ।
मिट्टी से क्या-क्या बने, कोई नहीं हिसाब ।।
 
रंगमंच संसार यह, अभिनेता हम लोग ।
किसको कैसी भूमिका, मिलने का संयोग ।।
 
जीवन में हो जब कभी, संभ्रम से अनुबन्ध ।
भरमाती मृग को बहुत, कस्तूरी की गन्ध ।।
 
जीवन के इस भेद को, जानें विरले लोग ।
पाँचों अपने घर चले, टूट गया संयोग ।।
 
बाह्य चक्षुओं से दिखे, संभ्रम सत्य-समान ।
जैसे पृथ्वी स्थिर दिखे, दिखे सूर्य गतिमान ।।
 
दुनिया में गुनवन्त जन, होते नहीं अनेक ।
एक सूर्य, इक चन्द्रमा, ध्रुवतारा भी एक ।।
 
कभी जेठ की धूप है, कभी माघ की धूप ।
एक धूप को दे दिये, किसने दो-दो रूप ?

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