Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 30,  फरवरी(प्रथम), 2018



कालजयी साहित्यकार प्रेमचन्द:
संवेदना, संघर्ष और मूल्यवत्ता का संदर्भ


डॉ. मधु संधु



Rani Saahiba Printed
Art Bhagalpuri Silk Saree

अभी अभी डॉ. राकेश प्रेम की पुस्तक ‘कालजयी प्रेमचन्द’ पढ़ने को मिली। डॉ. राकेश प्रेम हिन्दू कॉलेज अमृतसर के पूर्व प्रिंसिपल एवं प्रोफेसर रहे हैं। यह वही कॉलेज है, जिसने इस देश को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कामेडियन कपिल शर्मा दिये हैं। चिंतक और आलोचक होने से पहले राकेश प्रेम कवि हैं- कवि बंधु। उनका प्रथम काव्य संग्रह ‘पुष्पांजलि’ 1972 में प्रकाशित हुआ। यह छात्रावास्था के दिन थे कवि की उम्र सिर्फ उन्नीस वर्ष थी। तदान्तर ‘रंगों की पहचान में’ 1977 और ‘शब्दों के जंगल और जुगनू’ 1995 में प्रकाशित हुये। 2003 में हिन्दी साहित्य के इतिहास पर उनकी पुस्तक आई और आज, 2018 में, यानी इसके डेढ़ दशक बाद पाठकों को ‘कालजयी प्रेमचन्द’ पढ़ने को मिली है। यहाँ भी उनके चिंतक और सर्जक रूप का समन्वय दिखाई दिया। लिखते हैं- “प्रेमचंद साहित्य बौद्धिकता की जुगाली नहीं, भावमयता प्रेमचंद साहित्य का मूल तत्व है। ” ( रैपर -1) डॉ. राकेश प्रेम प्रेमचंद साहित्य को भारतीय रस- परम्परा से जोड़ते मानते हैं कि उनके साहित्य का स्थायी-भाव ओज सम्पुट करुण रस है। प्रेमचन्द हिन्दी साहित्य ही नहीं, विश्व साहित्य के पाठकों के लिए भी जाना पहचाना नाम है।


Amayra blue floral printed long length
anarkali Cotton kurti for womens

प्रेमचन्द हिन्दी के कथा सम्राट हैं, मील का पत्थर हैं, युग चेता, युग निर्माता, युग प्रवर्तक हैं। उन्होने 400 के आसपास कहानियाँ, दर्जन भर उपन्यास और नाटक लिखे। धनपतराय या नवाबराय जैसे सामंतवादी, पूंजीवादी नाम को त्याग प्रेमचन्द बने। सरकारी नौकरी छोड़ लेखन को समर्पित हुये। उर्दू से हिन्दी में आए और अश्क जैसे साहित्यकारों को भी उर्दू से हिन्दी में लाये। डॉ. राकेश प्रेम ने प्रेमचन्द को कालजयी विशेषण दिया है। कालजयी- यानी जिसने काल को जीत लिया हो, जो काल विशेष की सीमा में बद्ध न हो, जो सदैव प्रासंगिक हो, शाश्वत हो। अपने अभिमत को उन्होने चार शीर्षकों- अध्यायों के अंतर्गत स्थापित किया है- मानवीय संवेदना, संघर्षशीलता और मूल्यचेतना, राष्ट्र धर्म की अभिव्यक्ति एवं युग परिवर्तन।


Mammon Women's Handbag
And Sling Bag Combo(Hs-Combo-Tb,Multicolor)

1931 में आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी द्वारा लिखित पुस्तक ‘हिन्दी साहित्य: बीसवीं शताब्दी ’ के कुछ अंश उद्धृत कर, जैसे- ‘प्रेमचन्द जी का कोई स्वतन्त्र स्वानुभूत दर्शन नहीं है।‘ (पृ. 19) डॉ. राकेश उनसे अपनी असहमति दर्शाते प्रेमचन्द को मानवीय संवेदना के मुखर प्रहरी कहते हैं। निश्चय ही 1915 में प्रकाशित चंद्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ नही 1907 और 1909 में प्रकाशित प्रेमचन्द की ‘संसार का सबसे अनमोल रत्न’ को प्रथम हिन्दी कहानी कहा जा सकता है। डॉ. राकेश मानते हैं कि प्रेमचन्द की शब्द शक्ति भले ही अभिधा थी, लेकिन उसमें समाई ध्वन्यात्मकता उसे कालजयी बनाती है। सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की बात करते वे असंगति पर प्रहार और विसंगति पर कटाक्ष करते जाते हैं। कहते हैं कि प्रेमचंद ने जिस समाज की दुखती नब्ज पर हाथ रखकर कालातीत साहित्य की रचना की, वह अशिक्षित, असंगठित, शोषित और ग्रामीण समाज था। उसी कथ्य की संवेदना को मुखरित करना इस पुस्तक का लक्ष्य है, देंन है, उपलब्धि है। ऐसी संवेदना जिसमें अस्तित्व और अस्मिता, मानवीय गौरव और गरिमा सभी का सम्मिश्रण है।

उनके कालजयी साहित्य की दूसरी कसौटी डॉ. राकेश प्रेम ने प्रेमचंद के जीवंत पात्रों के जीवनगत विकराल संघर्ष और मूल्यचेतना को माना है। विद्रूप स्थितियों की विसंगति उनके पात्रों को तोड़ती नहीं, विवश करके झुका देती है। यही समय सत्य है, यही जीवन सत्य है, यही समाज सत्य है। कफन के घीसू माधव, सद्गति का दुखिया, पूस की रात का हलकू, ठाकुर का कुआं की गंगी, सवा सेर गेंहू की वृदधा सब विवशताओं के आगे झुक रहे हैं।

ब्रिटिश काल में राष्ट्र प्रेम का अलख जगाना, महाजनी सभ्यता के डैनों में फंसे असहाय व्यक्ति का चित्रण ही प्रेमचंद के साहित्य को कालजयी बनाता है। ‘रानी सारन्धा’ किसी बादशाह के जागीरदार की चेरी बनने से इंकार करती पति में देश प्रेम की भावना भरती है। ‘शतरंज के खिलाड़ी’ में राजनीतिक अध:पतन की चरमसीमा का चित्रण कालजयी साहित्यकार ही कर सकता है। यानी इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रेमचंद कालजयी साहित्यकार हैं।


Vaamsi Crepe Digital Printed Kurti
(VPK1265_Muti-Coloured_Free Size)

मेरे अपने विचार में प्रेमचंद के कालजयी होने का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आज उनकी मृत्यु के बयासी वर्ष बाद भी उन को पढ़ा जा रहा है, उन पर लिखा जा रहा है। हम मुड-मुड कर उनकी ओर ही देखते हैं। नारी विमर्श की बात होती है, तो हमारा ध्यान बड़े घर की बेटी की ओर जाता है। ‘ठाकुर का कुआं’ में दलित विमर्श के सूत्र हैं। ‘बेटों वाली विधवा’ वृद्ध विमर्श की बात करती है, ‘मिस पद्मा’ में आज की लिव इन रिलेशनशिप है। ‘पूस की रात’ में प्रगति वाद की गंध है कि किसान को मजदूर बनना ही होगा। ‘कफन’ में प्रबल अस्तित्व चेतना है जबकि सच्चाई यह है कि प्रेमचन्द वादों और विमर्शों के कटघरे में नहीं आते। डॉ राकेश प्रेम के अनुसार उनके यहाँ मिलने वाला विद्रोह भंजक का विद्रोह न होकर सर्जक का विद्रोह है। संवेदना, संघर्ष और मूल्यवत्ता उनके जीवन में रची- बसी है।

समीक्ष्य पुस्तक- कालजयी प्रेमचन्द
विधा- शोध एवं आलोचना
रचनाकार- डॉ. राकेश प्रेम
प्रकाशक- यश पब्लिशर्स, दिल्ली-32
संस्कारण- प्रथम, 2018
मूल्य- 195 रु.
समीक्षक- डॉ. मधु संधु
ई मेल- madhu_sd19@yahoo.co.in


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें

www.000webhost.com