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वर्ष: 2, अंक 30,  फरवरी(प्रथम), 2018



पापा की आँखों से


एस.के. गुडेसर


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रातें ऐसी थी कि जिनमे अंदर गर्मी लगे और बाहर सुबह तक ओस आकर ठंड हो जाए ।

हम बाहर ही सोते थे रजाई लेकर ।

मुझे अंदर सोने में मज़ा नहीं आता था क्योंकि मुझे जब तक चाँद घुर-घुर कर ना देखे मुझे नींद नहीं आती ।

उस रात हम अंदर ही सोये थे

उस रात चाँद तो दिखाई नहीं दे रहा था उमड़-उमड़ कर काली घटाएँ आ रही थी ।

मैने कुछ देर whatsapp चलाया और कुछ देर कविताएँ पढ़ी

"उधर नीम की कलंगी पकड़ने को झुके बादल.... उठे बादल झुके बादल..."

और फिर सो गया ।

सुबह उठा तो धीरे-धीरे ठंडी हवा चल रही थी। मैने चाय पी और पापा के साथ खेत जाने को तैयार हुआ सोचा घुम आउगा कुछ देर ।

हमारे खेत के कच्चे रसते पर सरसों ने अपने फूल बीछा रखे थे और लगा जैसे हवा गाना गुन-गुना रही हो...

पधारो म्हारे देश रे.....

पूरे लय से धीरे-धीरे ।

हमारे खेत से पहले एक बबुल के पेड़ ने अपने सारे पुष्प बीखेर रखे थे मैरे रस्ते में ।

"चुक के होठा दें नाल ला लयीं...."

अपने खेत में पहुँचा सरसों की सफेद टहनियों पर कुछ ओस की कुछ बारिश की बूँदे पड़ी थी। थोड़ा सा सूरज भी निकल गया था ।

"आज चुग ले ओस की बुंदे हँसनी मोती जान के..."

"हो जाए भँवरे शराबी पीके टुपका तरेल दा..."

मैने पापा को देखा और कुछ देर रुका......

फिर दुबारा खेत को देखा

फसलें सारी रात रोयी थी ओलों की मार से अभी तक उसके आँसु नहीं सूखे थे रो-रोकर धरती गीली कर दी थी।

हमारे खेत की धरती ने अपनी छाती से लगा रखा था सारी फसलों को ।

धरती की छाती करड़ी थी वो सब सह गयी थी चुप-चाप एक आँसु ना रोयी मेरे पापा की तरह ।

मैने पहली बार देखा था फसलों का दर्द, धरती की छाती, खेतों का विरानापन मेरे पापा की आँखों से पहली बार ।

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