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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



हिला रहीं क्यूँ दुम हैं


योगेन्द्र प्रताप मौर्य


                    


बोल रहीं हैं
सजी दुकानें
सब मानव गुमसुम हैं

शर्मिंदा हो 
अपनी जेबें
दिन-दिन जायें सिकुड़ती
क़ीमत लेकिन
आसमान से
नीचे नहीं उतरती

चेहरे-थैले 
लगते ज्यों कुम्ह-
लाये हुए कुसुम हैं

धूत नशे में 
है अब फैशन
भटक रहा है यौवन
बिकता है हर 
माल यहाँ पर
खुशियों से है अनबन

थका-थका 
मन सोचे बैठे
चुप-चुप क्यों हम तुम हैं

हाल न पूछो 
महँगाई की
बढ़ती बारहमासा
जीवनभर तक
दबी रह गयी
होरी की अभिलाषा

कर-कर वादे 
सत्ताएँ अब
हिला रहीं क्यूँ दुम हैं
                       

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