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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



ढोल


तुलसी तिवारी


                    

क्यों मिले मनमीत ? अब घर जाने को है.
झड़ गये पराग फूल मुरझाने को है .]
हो गई है शाम अब ताम छाने को है .
खाली हो गई है गागर, फिर पनघट जाने को है.
ख़त्म हो गया है दाम, अब हाथ झुलाने को है .
पीछे रह गई   जमात, तन्हाई साथ रहने को है.
पाप पुन्य का बोझ लिए, मन बहुत भारी सा है,
हुए बहुत  से काम; कुछ अभी करने को है.
आईं थी मिलने को खुशियाँ, उन्हें विदा करने को है.
पुराना हुआ दुशाला बहुत , अब नया बुनने को है,
देख लिया संसार बहुत . अब तुझे देखने को है.
बजाया बहुत है ढोल , अब चैन से सोने को है

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