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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



काश ऐसा होता


सुशील शर्मा


             
 
काश ऐसा होता 
अंतर्मन हम देख सकते 
टटोल सकते उस टूटन को 
जो कांच की तरह गड़ती है। 

काश ऐसा होता 
सत्य का संज्ञान लेकर 
चेतना से काव्य का सृजन होता 
अधूरे भावो को और टूटे शब्दों 
को पूर्ण कर पाते। 

काश ऐसा होता 
मौत को पढ़ पाती जिंदगी 
सृजन की क्रांति में 
आम आदमी के चेहरे पर 
जीने की ललक दिखती। 

काश ऐसा होता 
एक चिड़िया 
निर्द्वंद्व कंठ-से 
गाती मुक्ति का गाना 
और खुल जाते पिंजरे के द्वार 
अनंत आकाश की ओर। 
 
काश ऐसा होता 
तुम्हारा प्रलंबित मौन 
दर्द के शब्द बन पिघलता 
और बना देता 
हमारे तुम्हारे बीच 
संवेदनाओं का एक सेतु 
और जोड़ देता हम दो किनारों को। 


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