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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



तरस


एस.के. गुडेसर


 
                      
तुझसे बात करने को
तू मनाए मुझे इसलिए 
तुझसे नाराज होने को
मैं हर पल तरसती हूँ
मेरी सांसों से तेरी सांसों की खुशबू हर सांस आती रहे
मेरे अधरों पर इसलिए 
तेरे अधरों के भार को 
मैं हर दिन तरसती  हूँ
ये सोच सोच रात रात मुझे नींद नहीं आती 
सुकून से सो पाऊँ इसलिए
तेरे हाथ के सिरहाने को
मैं हर रात तरसती हूँ .............…...
तू ये सब मुझसे कह दे
मैं रात दिन हरपल तरसता हूँ .......


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