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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



इंसान


शुचि 'भवि'


 
                      
आसमां से ऊपर उड़ता किरदार था
जमीं पर रखता न कभी वो पांव था
चुन चुन चुगता था वो
अहसासों के दाने
सच्चाई से दूर तक न सरोकार था,,,

मुखौटे बदलने में था बेहद माहिर
दर्दों-गम अपने बस करता ज़ाहिर
सांसें छीन कई जीवनों से वो बेरहम
जिंदादिली की अद्भुत मिसाल था,,

बन मसीहा दिलों में उतरता था कुछ ऐसे
हर किसी का मानो वो भगवान था
अना से रहता था सदा भरा भरा
करता था हजारों को मजे ले  फ़ना
ईश् की कृति पर काला निशान था
कैसे कहें कि वो इक इंसान था???

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