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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



शीत लहर


सविता अग्रवाल “सवि”


 
 
बर्फ़ की रज़ाई में

पत्ते सो रहे हैं

वृक्षों के कोटरों में 

पंछी छिप रहे हैं

शीत के प्रकोप से

बूढ़े डर रहे हैं

धरा आज इनका

बोझ ढो रही है

ठंडी हवा से

जन आँख रो रही है

बादलों की टोली

जमी सी खड़ी है

चंचलता आज उनसे

दूर हो गई है

दीखता था आसमान

नीला जो अब तक

उसकी भी रंगत

फीकी हो रही है

छत से मकानों की

रेत सी है जो उड़ती

गिर गिर कर ज़मीं पर

अस्तित्व खो रही है

झरने का पानी भी

डर डर कर बह रहा है

मानों के सामने

कोई तूफ़ान खड़ा है

मछुआरों  की कश्ती

को क्या हो गया है

तैरने की आस में

बाट जोह  रही हैं

भूख से व्याकुल

गिलहरी चली है

ठण्ड उसे क्यों ना

सता रही है

छेद कर बर्फ़ की

चादर में वह तो

अपना और बच्चों का

खाना ला रही है

सूरज की तपिश

कहाँ खो गई है

लगता है उस पर

धुंध छा गई है

लिखूं कैसे गाथा मैं

शीत लहर की

लेखनी को मेरी

ये जमा रही है |
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