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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



अतृप्त इच्छा


रश्मि सुमन


 

जो स्वयं फूटती है मन से 
बिल्कुल धरती से कोंपल की तरह, जन्म लेती है उस भूख से,
जो मन के किसी कोने में 
दबी हुई अतृप्त इच्छा से, 
और
जिसे तृप्त करती अश्कों की स्याही.
जब जज़्बात मारते हैं कुलांचे,
 पन्नों पे उतरने को होते हैं एकदम आमादा.....
या हो कोई ऐसी भूख जो
कहीं पनप रही हो
आहिस्ता आहिस्ता.....
और उन्हें शांत करने का
न सूझे कोई जरिया,
तो मन तलाश ही लेता है 
अपनी अतृप्त, अनकही इच्छाओं को स्खलित करने का माध्यम,
जो होता है सिर्फ और सिर्फ कलम..
और फिर कलम से
बहते हैं एहसास व जज़्बात
 मन आतुरता से
 कहता जाता अपनी बात
उन अनकही, अतृप्त इच्छाओं से.....
जो अपनी बात कहने का,
स्खलित होने का....
 माध्यम तलाश कर लिया है
और इस तरह बन जाती है कविता

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